ईरान युद्ध के खतरे के बीच अमेरिका ने बातचीत का रास्ता खोला है और अपने बड़े अधिकारियों को पाकिस्तान भेजा है। लेकिन इसके साथ ही, उसने ईरान पर आर्थिक पाबंदियाँ और फौज की तैनाती भी बढ़ा दी है ताकि तेहरान को झुकने पर मजबूर किया जा सके।
व्हाइट हाउस ने बताया है कि राष्ट्रपति के खास दूत स्टीव विटकॉफ़ और जेरेड कुशनर शनिवार सुबह इस्लामाबाद पहुँच रहे हैं। वहां वे ईरान के प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे ताकि दोनों देशों के बीच जारी तनाव को कम किया जा सके। अमेरिकी दूतों और ईरान के विदेश मंत्री अराघची का एक ही समय पर पाकिस्तान पहुँचना एक बड़े कूटनीतिक अवसर की ओर इशारा करता है। हालांकि, अधिकारी अभी इसे पक्की बातचीत न मानकर केवल ‘बातचीत की शुरुआत‘ या आपसी तालमेल बनाने की कोशिश बता रहे हैं।

ईरान युद्ध में कूटनीति के लिए एक नाज़ुक अवसर
“अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कई दिनों से कोई बात नहीं हो रही थी। अब यह नई जानकारी तब सामने आई है जब दोनों देशों के बीच बातचीत पूरी तरह रुकी हुई है और माहौल काफी तनावपूर्ण है। हर कोई यही पूछ रहा है कि जब ईरान पर चारों तरफ से दबाव बढ़ाया जा रहा है, तो क्या वह सच में बातचीत के ज़रिए सुलह करने का मन बना चुका है या नहीं।
व्हाइट हाउस का कहना है कि अभी पक्की और आधिकारिक बातचीत शुरू नहीं हुई है। यह तो बस एकशुरुआती मुलाक़ात है ताकि आगे का रास्ता साफ किया जा सके। इस मुलाक़ात का मकसद बस इतना है कि यह साफ़ हो सके कि क्या अभी भी बातों से मसला सुलझ सकता है या फिर कूटनीति के लिए अब कोई जगह नहीं बची है। इस बार की टीम में एक बड़ी कमी खटक रही है, वह है उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का न होना। पिछली बार उन्होंने ही बातचीत की अगुवाई की थी, पर इस बार उन्हें इस महत्वपूर्ण दौरे से बाहर रखा गया है। अधिकारियों का कहना है कि वे अभी वॉशिंगटन में ही रुककर नज़र रखे हुए हैं। अगर पाकिस्तान में हो रही बातचीत कामयाब रहती है, तो उन्हें आगे की चर्चा के लिए वहां बुलाया जा सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वे अभी भी ईरान से बातचीत करने को तैयार हैं। उनके मुताबिक, ईरान के पास अभी भी एक आखिरी मौका है कि वह अपने परमाणु हथियारों का इरादा छोड़ दे और पूरी दुनिया को इसका सबूत दे।
सैनिक जमावड़े से दांव ऊंचे हो गए हैं
जहां एक ओर कूटनीति चल रही है, वहीं ईरान युद्ध का सैनिक पहलू लगातार और तेज़ होता जा रहा है। अमेरिका ने मध्य-पूर्व में अपना तीसरा विमानवाहक पोत, USS जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश तैनात कर दिया है, जो USS जेराल्ड आर. फोर्ड और USS अब्राहम लिंकन के साथ शामिल हो गया है।
2003 के बाद यह पहली बार है कि इस क्षेत्र में एक ही समय पर तीन अमेरिकी विमानवाहक पोत तैनात किए गए हैं। रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने इस तैनाती को तत्काल तनाव बढ़ाने के बजाय अपनी क्षमता का संकेत बताया।
रिटायर्ड जनरल मार्क किमिट ने भी इस बात को सही ठहराया। उन्होंने समझाया कि इतनी बड़ी संख्या में सेना तैनात करने से ज़रूरत पड़ने पर तेज़ी से फैसले लेने और कार्रवाई करने में काफी आसानी होती है। उन्होंने बताया कि ये विशाल जहाज़ एक तरह के ‘पानी पर तैरते हवाई अड्डे‘ हैं। इनकी मदद से अमेरिकी सेना को दूसरे देशों के बेस (Base) इस्तेमाल करने की ज़रूरत नहीं पड़ती और वे सीधे समंदर से ही अपनी कार्रवाई कर सकते हैं।
हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि इस क्षेत्र में 200 से ज़्यादा लड़ाकू विमानों की मौजूदगी से गलत अनुमान लगाने का खतरा काफी बढ़ गया है, खासकर तब जब तनाव अभी भी काफी ज़्यादा है।
प्रतिबंधों और तेल युद्ध से दबाव बढ़ा
अमेरिका ने ईरान को कमज़ोर करने के लिए फौजी कार्रवाई के साथ अब पैसों की सप्लाई रोकने का भी बड़ा कदम उठाया है। इसी कड़ी में चीन की एक तेल रिफाइनरी (Hengli Petrochemical) और तेल ले जाने वाली 40 कंपनियों पर पाबंदी लगा दी गई है, ताकि ईरान अपना तेल न बेच सके।
इन पाबंदियों का मकसद उस रास्ते को बंद करना है जहाँ से ईरान को सबसे ज़्यादा पैसा मिलता है। यह सरकार के उस बड़े प्लान का हिस्सा है जिससे ईरान की आर्थिक घेराबंदी की जा रही है। इससे यह पता चलता है कि अमेरिका उन देशों और कंपनियों को भी सज़ा देने के लिए तैयार है जो ईरान के साथ व्यापार करते हैं। वह किसी को भी अपनी पाबंदियों के दायरे से बाहर नहीं छोड़ना चाहता।
दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की सप्लाई के लिए सबसे ज़रूरी रास्ते, हॉर्मुज की खाड़ी में अमेरिकी जहाज़ों के पहरे ने मुश्किलों को और बढ़ा दिया है, जिससे अब बातचीत का रास्ता और कठिन हो गया है। जहाजों के रास्ते बंद होने से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ गए हैं और पूरी दुनिया में सामान का आना-जाना मुश्किल हो गया है। इस रुकावट ने वैश्विक बाज़ार को बुरी तरह प्रभावित किया है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने एक पुराने कानून (जोन्स एक्ट) में 90 दिनों की छूट दी है। इसका फायदा यह होगा कि अब दूसरे देशों के जहाज़ भी आसानी से तेल और गैस ला-ले जा सकेंगे, जिससे ऊर्जा की किल्लत कम होगी। सरकार चाहती है कि देश में तेल और गैस के दाम और न बढ़ें। अभी कच्चे तेल की कीमत $103 से $107 के आसपास है, जो लड़ाई शुरू होने से पहले के रेट से आधे से भी ज़्यादा (50%) महंगी हो गई है।
क्षेत्रीय तनाव बढ़ रहा है
ईरान युद्ध अब केवल कूटनीति और आर्थिक दबाव तक सीमित नहीं है। मध्य पूर्व में कई मोर्चों पर हिंसा जारी है।
दक्षिणी लेबनान में, इजरायली सेना ने बिन्त जबील के पास झड़पों के दौरान छह हिजबुल्लाह लड़ाकों को मार गिराने की सूचना दी है। इस बीच, सीमा पार से गोलाबारी और हवाई हमलों में याटर और तैबेह जैसे कस्बों में कई नागरिक घायल हो गए हैं।
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि नाजुक युद्धविराम विस्तार के बावजूद इजरायल को “कार्रवाई की पूरी स्वतंत्रता” प्राप्त है। हाल ही में तीन सप्ताह के लिए बढ़ाया गया युद्धविराम अभी भी तनावपूर्ण बना हुआ है क्योंकि दोनों पक्ष एक-दूसरे पर उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं।
गाजा में, कमाल अदवान अस्पताल के पास इजरायली हमलों में हताहत हुए हैं, जिससे व्यापक संघर्ष की मानवीय क्षति और भी स्पष्ट हो गई है। फिलिस्तीनी अधिकारियों ने पिछले युद्धविराम समझौतों के बावजूद लगातार हमलों की सूचना दी है।
ईरान की कूटनीतिक पहल
जब हर तरफ से दबाव बढ़ रहा है, तब ईरान हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठा है। वह बातचीत और कूटनीति का रास्ता तलाश रहा है ताकि इस मुश्किल हालात से बाहर निकलने का कोई रास्ता मिल सके। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची पाकिस्तान, ओमान और रूस के दौरे पर जा रहे हैं। वे वहां के बड़े नेताओं से मिलकर अपनी दोस्ती को मजबूत करने और इलाके में चल रही हलचल को शांत करने पर बात करेंगे।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान के विदेश मंत्री पाकिस्तान इसलिए आए हैं क्योंकि पाकिस्तान के रिश्ते अमेरिका और ईरान दोनों से अच्छे हैं। वे चाहते हैं कि पाकिस्तान बीच-बचाव (Mediation) करके इस झगड़े को सुलझाने में मदद करे। वहीं दूसरी ओर, ओमान अभी भी अमेरिका और ईरान के बीच एक गुप्त कड़ी का काम कर रहा है। वह दोनों देशों के संदेश एक-दूसरे तक पहुँचाने का एक ऐसा रास्ता है जिसके बारे में दुनिया को ज़्यादा पता नहीं चलता।
अराघची का यह दौरा जब रूस पहुँचेगा, तो वह सबसे महत्वपूर्ण समय होगा। ईरान और रूस के बीच होने वाली यह आखिरी मुलाकात तय करेगी कि आने वाले दिनों में युद्ध और कूटनीति का रुख क्या होगा। विश्लेषकों का कहना है कि ईरान को अब रूस से बड़ी मदद की उम्मीद है। वह चाहता है कि रूस दुनिया के सामने उसका पक्ष ले और अगर लड़ाई बढ़ती है, तो फौज या हथियारों के मामले में भी उसका साथ दे।
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने पहले ही पाकिस्तान के नेताओं से मौजूदा संकट पर बात कर ली है। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि शांति के लिए पाकिस्तान जो भी बातचीत या मध्यस्थता कर रहा है, रूस उसके साथ खड़ा है।
इतने प्रयासों के बाद भी अमेरिका और ईरान के बीच की दूरी कम नहीं हुई है। जानकारों का कहना है कि ईरान को अब अमेरिका पर भरोसा नहीं रहा, क्योंकि पिछली बार की बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला था। यही डर दोनों देशों को करीब आने से रोक रहा है।
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Author: Rajesh Srivastava
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