परिसीमन बिल पर राजनीतिक घमासान, PM मोदी ने निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर ज़ोर दिया
नई दिल्ली: गुरुवार को संसद में काफी गहमागहमी रही। केंद्र सरकार ने विशेष सत्र में कुछ नए कानून पेश किए, लेकिन परिसीमन बिल पर सरकार और विपक्ष के बीच गहरा मतभेद होने की वजह से यह एक बड़ा विवाद बन गया है। पीएम मोदी ने जब प्रशासन में महिलाओं को आगे लाने की बात कही, तो इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच आर-पार की लड़ाई शुरू हो गई और दोनों के विचार पूरी तरह अलग नज़र आए।
लोकसभा में बोलते हुए मोदी जी ने कहा कि देश की तरक्की तभी मुमकिन है जब कानून बनाने में महिलाओं का हिस्सा पुरुषों के बराबर हो। उन्होंने कहा कि देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए महिलाओं की बात सुनना बहुत ज़रूरी है। उन्होंने इस बात को भारत के लोकतंत्र के लिए एक बहुत बड़ा और यादगार बदलाव बताया। पीएम मोदी ने ये बातें तब कहीं, जब सरकार ने आधिकारिक तौर पर 2026 का 131वां संविधान संशोधन बिल और परिसीमन से जुड़े नए कानून संसद में पेश किए।

दूरगामी असर वाला एक विधायी कदम
महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण तभी लागू हो पाएगा जब यह परिसीमन बिल पास होगा, क्योंकि यह उसी पुरानी योजना का अगला और ज़रूरी कदम है। सरकार का प्लान है कि 2029 के चुनावों तक संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित कर दी जाएं। लेकिन यह सब तभी मुमकिन होगा जब चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं फिर से तय की जाएंगी और मुमकिन है कि इसके साथ लोकसभा की सीटों की संख्या भी बढ़ा दी जाए।
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने नया बिल पेश किया और बहस शुरू की। उन्होंने कहा कि सबको बराबरी का हक और सही पहचान दिलाने के लिए चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना (परिसीमन) बहुत ज़रूरी है। अमित शाह ने भी इसके बाद एक और बिल पेश किया, जिससे साफ़ हो गया कि सरकार चुनाव कराने के पुराने सिस्टम में बड़े सुधार करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
प्रस्ताव में कहा गया है कि लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 850 किया जाए, जो पहले 543 थीं। इस फैसले का एक बड़ा प्रभाव पड़ेगा और साथ ही देश की राजनीति और सत्ता के संतुलन में भी एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। सरकार ने अपने बयान में कहा है की इस काम को निष्पक्ष होगा एवं सबके भले के लिए होगा, लेकिन कुछ लोगों को डर है कि इससे राज्यों के बीच सत्ता का बँटवारा असंतुलित हो सकता है।
विपक्ष ने सरकार की मंशा पर चिंता जताई
विपक्ष ने इस पर भारी विरोध जताया और कहा कि सरकार इस बिल को सिर्फ इसलिए लाई है ताकि इसे राजनीतिक फायदे के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सके, न कि संविधान की ज़रूरत पूरा करने के लिए। कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल ने कहा कि सरकार संविधान के नियमों के साथ खिलवाड़ कर रही है। दूसरी तरफ, शशि थरूर ने भी सवाल उठाया कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने के पीछे सरकार की असली मंशा क्या है।
शशि थरूर ने कहा कि चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं को बदलने का सरकार का यह प्लान उन जगहों को ज़्यादा फ़ायदा पहुँचा सकता है जहाँ उनकी अपनी पार्टी मज़बूत है। उन्होंने इसे एक तरह का चुनावी पक्षपात बताया। क्षेत्रीय नेताओं को डर है कि अगर सीटों का बँटवारा सिर्फ आबादी के हिसाब से हुआ, तो दक्षिण के राज्यों की संसद में आवाज़ कमज़ोर पड़ सकती है। उनका कहना है कि अच्छी गवर्नेंस और कम आबादी का नुकसान उन्हें नहीं मिलना चाहिए।
कार्ति चिदंबरम ने कहा कि कांग्रेस महिलाओं को आरक्षण देने के साथ है, पर चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं को बदलने (परिसीमन) के मुद्दे पर सरकार का कड़ा विरोध करेगी। उन्होंने कहा कि अगर लोकसभा में सांसदों की संख्या बढ़ाई गई, तो हर सांसद को बोलने का मौका कम मिलेगा। इससे वे अपने इलाके की ज़रूरतों और शिकायतों को सदन के सामने पहले की तरह मजबूती से नहीं रख पाएंगे।
PM मोदी ने इसे एक ऐतिहासिक अवसर बताया
पीएम मोदी ने अपने भाषण में कहा कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कोशिश की कि सभी पार्टियाँ अपने आपसी झगड़ों को भूलकर देश के हित में इस पर बात करें। उन्होंने साफ-साफ कहा कि महिलाओं को आरक्षण देना उन पर कोई अहसान करना नहीं है। यह तो उनका अपना अधिकार है, जिसकी मांग बहुत पहले से की जा रही थी और जिसे अब पूरा किया जा रहा है। उन्होंने सभी पार्टियों के सांसदों से विनती की कि वे अपने निजी फायदों को भूलकर इस कानून के साथ खड़े हों। उन्होंने कहा कि यह काम किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे देश को मज़बूत बनाने की कोशिश है।
उन्होंने पक्का भरोसा दिलाया कि परिसीमन बिल की वजह से किसी भी राज्य के साथ सौतेला व्यवहार नहीं होगा और सबको बराबरी का हक मिलेगा। उन्होंने कहा कि संसद में राज्यों की सीटों का जो पुराना मेल-जोल (Ratio) है, उसे वैसा ही रखा जाएगा। इससे दक्षिण के राज्यों का यह डर खत्म हो जाएगा कि उनकी ताकत या आवाज कम हो सकती है।
PM मोदी का मानना है कि एक विकसित भारत केवल अच्छी सड़कों और मज़बूत अर्थव्यवस्था तक ही सीमित नहीं है। उसके विपरीत, उनका मानना है कि ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को पाने के लिए समावेशी शासन (inclusive governance) की ज़रूरत है, जहाँ नीतियाँ समाज के सभी वर्गों की आकांक्षाओं को दर्शाती हों।
स्थानीय प्रभाव और क्षेत्रीय चिंताएँ
परिसीमन बिल की वजह से दक्षिण के राज्यों में काफी नाराज़गी है। वहां के नेताओं को डर लग रहा है कि अगर यह बिल पास हो गया, तो लोकसभा में उनकी सीटों की संख्या कम हो जाएगी और उनकी आवाज़ पहले जैसी मज़बूत नहीं रहेगी। दक्षिण के राज्यों को डर है कि जनसंख्या-आधारित परिसीमन दिल्ली की सत्ता की चाबी केवल उन उत्तरी राज्यों को सौंप देगा जहाँ आबादी तेज़ी से बढ़ी है, जिससे तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों का रसूख घट जाएगा।
इसकी वजह से एक बहुत गंभीर प्रश्न उठने लगा है कि क्या राज्यों के बीच में शक्ति का बँटवारा सही है? और क्या हर इलाके को संसद में बराबर का हक मिल रहा है? विशेषज्ञों के अनुसार सीटों के बँटवारे को बहुत ही सावधानीपूर्वक संपन्न करना होगा; उन राज्यों को ज्यादा ध्यान देना होगा जिनकी आबादी कम है, कहीं ऐसा न हो कि उनकी संसद में ताकत कम न हो जाए।
इससे संघीय संतुलन और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व के बारे में महत्त्वपूर्ण सवाल खड़े हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सीटों के बँटवारे में किसी भी बदलाव के दौरान, जनसांख्यिकीय विविधताओं के साथ-साथ राज्यों द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के लिए किए गए प्रयासों पर भी सावधानीपूर्वक विचार किया जाना चाहिए।
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Author: Rajesh Srivastava
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