ईरान-इजरायल युद्ध : मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने के बीच अमेरिका-ईरान की अहम बातचीत जल्द ही खत्म हो गई
ईरान-इजरायल युद्ध : इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच पहले दौर की बातचीत दो घंटे से भी कम समय में खत्म हो गई। यह घटना दिखाती है कि मौजूदा संघर्षविराम (Ceasefire) कितना कमजोर है। हालांकि बैठक के बाद थोड़ी उम्मीद तो दिखी, लेकिन आपसी अविश्वास अब भी बरकरार है। राजनयिकों द्वारा भले ही दिवार के पीछे हाथ मिलाया गया परन्तु मिडिल-ईस्ट की जमीनी सच्चाई कुछ और ही है । मिडिल-ईस्ट की ऐसी कहानी जिसमे मिस्ले और ड्रोन हमले बढ़ रहे थे और पूरे मिडिल-ईस्ट तनाव की स्थिति में था।
भारी सुरक्षा और दुनिया की नज़रों के बीच बातचीत शुरू
वॉशिंगटन और तेहरान के प्रतिनिधिमंडल बेहद कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच इस्लामाबाद पहुँचे, जिससे पाकिस्तानी राजधानी लगभग वीरान नज़र आ रही थी। सड़कें सील कर दी गई थीं, निवासियों को घरों के अंदर रहने की सलाह दी गई थी, और शहर एक लॉकडाउन ज़ोन जैसा लग रहा था। यह सब 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से अब तक की सबसे अहम कूटनीतिक बातचीत से पहले हो रहा था।
ईरानी प्रतिनिधिमंडल, जिसका नेतृत्व संसद के स्पीकर बाघर ग़ालिबफ़ कर रहे थे और जिसमें वरिष्ठ राजनयिक अब्बास अराघची भी शामिल थे, दिन की शुरुआत में ही एक मज़बूत संदेश के साथ पहुँचा। तेहरान बातचीत के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन वह अपने संप्रभु हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। दूसरी ओर, अमेरिकी टीम, जिसका नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे थे और जिनके साथ मध्य-पूर्व के दूत स्टीव विटकॉफ़ और जेरेड कुशनर भी थे, बाद में पहुँची। यह वॉशिंगटन के इस इरादे का संकेत था कि वह पूरे क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए ज़ोर देगा।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्था की है और इस बातचीत को एक स्थायी शांति की दिशा में संभवतः यह एक मजबूत कदम है और ये कहना गलत नहीं होगा की ये ‘करो या मरो’ की उत्पन्न हो गई है।
दबाव में संघर्ष-विराम
तमाम कूटनीतिक कोशिशों के बाद भी ईरान-इज़राइल युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा और कई मोर्चों पर इसकी तल्खी और बढ़ती जा रही है। लेबनान पर इज़रायल की बमबारी अब इस पूरे टकराव का सबसे खौफनाक हिस्सा बन गई है। हाल ही में हुए हमलों में 300 से ज़्यादा जानों का जाना इस लड़ाई के अब तक के सबसे घातक दिनों में गिना जा रहा है। इन हमलों के बाद अब यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या संघर्ष-विराम (सीज़फ़ायर) की शर्तें हिज़्बुल्लाह पर भी लागू होंगी, जो इस इलाके में ईरान का सबसे मज़बूत साथी है।

इज़राइल की सेना का दावा है कि उसने 24 घंटों के भीतर हिज़्बुल्लाह के 200 से ज़्यादा ठिकानों को निशाना बनाया है, जिसमें दक्षिणी लेबनान पर विशेष ध्यान दिया गया है। इस बीच, हिज़्बुल्लाह ने सीमा के पास इज़राइली सैन्य ठिकानों और बस्तियों को निशाना बनाते हुए रॉकेटों की बौछार और ड्रोन हमलों से जवाबी कार्रवाई की है।
ईरान ने साफ़ कर दिया है कि उनके सहयोगी देशों पर लगातार हमले किए जा रहे हैं और अगर ये हमले नहीं रोके जाएंगे तो उनको भी करारा जवाब मिलेगा। इसके साथ ही दूसरी तरफ, तेहरान ने स्ट्रेट ऑफ़ होर्मूज़ में अपनी पकड़ को मजबूत कर दिया है; यह एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग है, जिससे दुनिया भर में तेल की आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा गुज़रता है।
होरमुज़ जलडमरूमध्य बना रणनीतिक हथियार
होरमुज़ जलडमरूमध्य संघर्ष और बातचीत, दोनों के केंद्र में बना हुआ है। इस रास्ते से होने वाला शिपिंग ट्रैफिक काफ़ी कम हो गया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों में चिंताएँ बढ़ गई हैं। रिपोर्टों के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति में आई रुकावटों की भरपाई करने के लिए 60 से ज़्यादा तेल टैंकरों को संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर मोड़ा जा रहा है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि जलडमरूमध्य को साफ़ करने के प्रयास पहले से ही चल रहे हैं, और ज़ोर देकर कहा कि ईरान की सैन्य क्षमताएँ काफ़ी कमज़ोर हो गई हैं। हालाँकि, ऐसे बयानों पर संदेह जताया गया है, खासकर इसलिए क्योंकि ईरानी अधिकारी इस जलमार्ग पर अपने नियंत्रण पर लगातार ज़ोर दे रहे हैं।
तेहरान हॉर्मुज़ को सिर्फ अपनी ज़मीन का हिस्सा नहीं मानता, बल्कि इसे बातचीत में अपनी बात मनवाने के एक बड़े ज़रिये के रूप में इस्तेमाल करता है। ईरानी वार्ताकारों ने बातचीत में बहुत सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वे हॉर्मुज़ के रास्ते पर तभी ढील देंगे जब उन पर लगे प्रतिबंध हटेंगे, युद्ध के नुकसान का पैसा मिलेगा और उनकी रोकी गई अरबों की संपत्ति उन्हें वापस मिलेगी।
बातचीत के अंदर: प्रोग्रेस या दिखावा
बातचीत से वाकिफ सूत्रों के मुताबिक, इस्लामाबाद बातचीत के अंदर का माहौल “पॉजिटिव” बताया गया, जिसमें लेबनान जैसे खास मुद्दों पर कुछ शुरुआती तरक्की हुई और ईरानी एसेट्स पर पाबंदियों में ढील की संभावना थी। हालांकि, दोनों तरफ के अधिकारियों ने चेतावनी दी कि अभी कोई नतीजा निकालना जल्दबाजी होगी।
खबर है कि बातचीत दो घंटे से थोड़ी कम चली, जो इतनी बड़ी बातचीत के लिए काफी कम समय है, जिससे पता चलता है कि दोनों पक्ष गहरे समझौते में शामिल होने के बजाय अभी भी हालात का जायज़ा ले रहे हैं।
एक US अधिकारी ने उन खबरों से इनकार किया कि वाशिंगटन कतर में रखे ईरानी फंड को अनफ्रीज करने पर सहमत हो गया है, जबकि ईरानी प्रतिनिधियों ने कहा कि किसी भी पक्के समझौते में आर्थिक छूट शामिल होनी चाहिए।
इतनी असहमतियों के बावजूद, दोनों पक्ष बातचीत जारी रखने को तैयार हैं। अब डिनर पर एक और दौर की बातचीत होगी, जिससे साफ़ पता चलता है कि बातचीत के दरवाज़े अभी भी खुले हैं।
संकट में भारत की सीधी हिस्सेदारी
ईरान और इज़रायल की लड़ाई के बीच भारत के लिए भी मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं, क्योंकि इस स्थिति का सीधा असर भारत पर पड़ना तय है। ईरान में फंसे 312 भारतीय मछुआरों को आर्मेनिया के रास्ते सही-सलामत भारत वापस लाया गया है। इससे पहले पिछले हफ्ते ही 345 मछुआरों के एक और समूह को भी बचाया गया था।
एस. जयशंकर ने मदद के लिए आर्मेनिया का शुक्रिया अदा किया और बताया कि ऐसे मुश्किल समय में दुनिया भर के देशों का साथ मिलकर काम करना कितना ज़रूरी है। इन लोगों को जिस तरह निकाला गया, उससे साफ़ पता चलता है कि लड़ाई का असर सिर्फ सैनिकों पर नहीं, बल्कि आम जनता पर भी हो रहा है, चाहे वे जंग वाली जगह से कितनी ही दूर क्यों न हों।
भारत की तेल की ज़रूरतें खतरे में हैं, क्योंकि हम अपनी ज़रूरत का ज़्यादातर तेल खाड़ी के देशों से ही मंगाते हैं। अगर हॉर्मुज़ का समुद्री रास्ता लंबे समय के लिए बंद हुआ, तो इसके बुरे नतीजे होंगे। पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ जाएँगे और सामान की आवाजाही में बड़ी दिक्कतें आएँगी।
विशेषज्ञों की राय: आगे का नाज़ुक रास्ता
अगर गहराई से समझें, तो यह कूटनीति का एक ऐसा उदाहरण है जहाँ बातचीत जंग को रोकने के बजाय, जंग के साथ-साथ चल रही है। भले ही दोनों देश बातचीत करने को तैयार लग रहे हों, लेकिन दोनों की शर्तें और इरादे एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं।
ईरान चाहता है कि उसकी अर्थव्यवस्था सुधरे और दुनिया उसे एक बड़ी ताकत माने। वहीं, अमेरिका चाहता है कि ईरान का दूसरे देशों में दखल कम हो जाए और उसके दोस्तों, खासकर इज़राइल, पर कोई आंच न आए।
हिज़्बुल्लाह, सऊदी अरब और चीन जैसे देशों और गुटों के इस विवाद में कूदने से स्थिति बहुत ज़्यादा उलझ गई है। अब ऐसा नहीं लगता कि यह मामला जल्द सुलझ पाएगा।
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Author: Rajesh Srivastava
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