Varanasi में कैंसर उपचार में नई उम्मीद: BHU के शोधकर्ताओं ने ‘दुधिया घास’ से बढ़ाई दवा की असरकारी क्षमता 50 प्रतिशत तक
कैंसर जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी के इलाज में Varanasi से एक नई उम्मीद जगमगाई है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में एक ऐसे जंगली पौधे की पहचान की है, जो भविष्य में कैंसर उपचार को न केवल सस्ता बल्कि अधिक सुरक्षित और प्रभावी बना सकता है। BHU के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. रवींद्र नाथ खरवार और शोधार्थी वीर सिंह गौतम ने यह खोज की है कि दुधिया घास (वैज्ञानिक नाम: Euphorbia hirta, जिसे स्थानीय लोग पत्थरचट्टा के नाम से जानते हैं) के अंदर पाए जाने वाले एक फंगस निग्रोस्पोरा स्फेरिका से बना रूटीन एंटीऑक्सीडेंट कैंसर की दवाओं की क्षमता को लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ा देता है।
यह शोध अब न केवल BHU में चर्चा का विषय है, बल्कि इसे ब्रिटेन के प्रतिष्ठित जर्नल ‘प्रोसेस बायोकेमिस्ट्री’ (Elsevier) में भी प्रकाशित किया गया है।

कैसे हुआ शोध?
शोधकर्ताओं ने सबसे पहले दुधिया घास की पत्तियों और तनों को शुद्ध किया ताकि बाहरी सतह पर मौजूद सूक्ष्मजीव समाप्त हो जाएं। फिर इन्हें पेट्री डिश में रखा गया, जहां कुछ दिनों बाद विभिन्न फंगस विकसित हुए। इसके बाद प्रत्येक फंगस का अलग-अलग कल्चर तैयार किया गया और उनके गुणों की जांच की गई। इस प्रक्रिया में यह पाया गया कि निग्रोस्पोरा स्फेरिका नामक फंगस रूटीन (Rutin) नामक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट का उत्पादन करता है।
यह एंटीऑक्सीडेंट शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव, विषाक्त तत्वों और दवा के दुष्प्रभावों से बचाता है। यही वजह रही कि जब रूटीन को कैंसर रोधी दवा सिसप्लैटिन के साथ मिलाकर दिया गया, तो इसके परिणाम चौंकाने वाले रहे।

सिसप्लैटिन के साथ प्रयोग
सिसप्लैटिन एक प्रसिद्ध एंटी-कैंसर ड्रग है, जो मेसोथेलियोमा सहित कई प्रकार के कैंसर में दी जाती है। हालांकि यह दवा असरदार होते हुए भी कई दुष्प्रभाव पैदा करती है — जैसे कि गुर्दों पर असर, मतली और कोशिकाओं को नुकसान।
डॉ. खरवार की टीम ने सिसप्लैटिन को चार समूहों पर परीक्षण किया:
- पहला समूह – केवल सिसप्लैटिन दवा दी गई।
- दूसरा समूह – किसी भी दवा का प्रयोग नहीं किया गया।
- तीसरा समूह – सिसप्लैटिन के साथ रूटीन एंटीऑक्सीडेंट दिया गया।
- चौथा समूह – केवल रूटीन एंटीऑक्सीडेंट दिया गया।
परिणामों में पाया गया कि तीसरे समूह, यानी जहां सिसप्लैटिन और रूटीन दोनों साथ दिए गए थे, वहां कैंसर सेल्स 50% अधिक तेजी से खत्म हुए, जबकि सामान्य कोशिकाएं पूरी तरह सुरक्षित रहीं।
इस खोज से यह संकेत मिला कि कैंसर की दवाओं की प्रभावशीलता को प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट की मदद से काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है।
दुधिया घास और फंगस की खासियत
आयुर्वेद में दुधिया घास का प्रयोग सदियों से होता आया है। इसे अस्थमा, घाव भरने, त्वचा संक्रमण और कई अन्य बीमारियों में उपयोग किया जाता रहा है। इसमें मौजूद निग्रोस्पोरा स्फेरिका फंगस न केवल पौधों की सेहत को बेहतर रखता है, बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो रहा है।
प्रो. खरवार के अनुसार, ऐसे सूक्ष्मजीव पौधों को विभिन्न प्रकार के जैविक और अजैविक तनावों — जैसे बीमारी, तापमान में बदलाव और सूखे से बचाते हैं। यह फंगस रोग फैलाने की बजाय पौधों और पर्यावरण के लिए लाभकारी साबित होता है।
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अब जानवरों पर होगा परीक्षण
शोध टीम को इस एंटीऑक्सीडेंट के प्री-क्लिनिकल एनिमल ट्रायल की अनुमति मिल चुकी है। आने वाले महीनों में इसका परीक्षण जानवरों पर किया जाएगा। इसके सफल परिणाम मिलने के बाद यह तकनीक मानव परीक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम होगी।
डॉ. खरवार का मानना है कि यह खोज भविष्य में कैंसर इलाज को सस्ता, सुरक्षित और ज्यादा असरदार बनाने में मदद करेगी। साथ ही, यह शोध यह भी दर्शाता है कि प्रकृति में मौजूद सूक्ष्मजीवों और पौधों के बीच की साझेदारी हमारे स्वास्थ्य के लिए कितनी उपयोगी हो सकती है।
Varanasi से निकला संदेश
Varanasi केवल आध्यात्मिकता का केंद्र नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान का भी उभरता हुआ केंद्र बनता जा रहा है। BHU के इस शोध ने यह साबित किया है कि यदि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का मेल किया जाए, तो कैंसर जैसी जटिल बीमारियों के इलाज में भी नई दिशा मिल सकती है।
यह खोज Varanasi की धरती से निकली वह वैज्ञानिक आशा की किरण है, जो न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में कैंसर उपचार की तस्वीर बदल सकती है।
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Author: kamalkant
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