Dev Diwali क्या है?

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Dev Diwali क्या है? जानिए देवताओं की Diwali की पौराणिक कथा, मान्यता और वाराणसी का भव्य उत्सव

Dev Diwali — जिसे “देवों की दीपावली” भी कहा जाता है — हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। यह पर्व दीपावली के ठीक 15 दिन बाद आता है। इस दिन पूरे भारत में श्रद्धा और भक्ति का माहौल होता है, लेकिन वाराणसी (काशी) में इसका सबसे भव्य रूप देखने को मिलता है।

गंगा के किनारे बसे घाटों पर लाखों दीप जलाए जाते हैं। जब अस्सी घाट से लेकर पंचगंगा घाट तक दीपों की रौशनी झिलमिलाती है, तो पूरा काशी नगरी स्वर्ग जैसी प्रतीत होती है।

कहते हैं कि जिस तरह हम सब भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी पर दीपावली मनाते हैं, उसी तरह देवता राक्षस त्रिपुरासुर के वध पर Dev Diwali मनाते हैं।

Dev Diwali की पौराणिक कथा और मान्यता

पुराणों के अनुसार, एक बार त्रिपुरासुर नामक असुर ने तीन नगर (त्रिपुर) बनाकर तीनों लोकों में आतंक मचा दिया था। वह इतना शक्तिशाली हो गया कि देवता भी उससे हार गए। तब सभी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और उनसे मुक्ति की प्रार्थना की। भगवान शिव ने अपने पशुपतास्त्र (त्रिशूल) से त्रिपुरासुर का संहार किया।

यह युद्ध कार्तिक पूर्णिमा के दिन समाप्त हुआ। जब राक्षस का अंत हुआ, तब देवताओं ने प्रसन्न होकर भगवान शिव की आराधना की और दीप जलाकर विजय उत्सव मनाया। इसी दिन से यह पर्व Dev Diwali कहलाया — यानी वह दीपावली जिसे देवता स्वयं मनाते हैं।

Dev Diwali क्या है?

Dev Diwali का धार्मिक महत्व

Dev Diwali का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। माना जाता है कि इस दिन देवता स्वयं गंगा में स्नान करने पृथ्वी पर उतरते हैं। इसी कारण इस दिन गंगा स्नान और दीपदान का विशेष पुण्य माना गया है।

वाराणसी, जिसे भगवान शिव की नगरी कहा जाता है, इस दिन स्वर्गलोक जैसी दिखाई देती है। घाटों पर हज़ारों भक्त दीप जलाते हैं, गंगा आरती होती है और वातावरण “हर हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठता है।

इस दिन दान, पुण्य, दीपदान और भक्ति का अत्यधिक महत्व होता है। कहा जाता है कि इस दिन गंगा में स्नान और दीपदान करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

Dev Diwali का उत्सव — आस्था, दीपदान और गंगा आरती का संगम

  1. सुबह गंगा स्नान और भगवान शिव की पूजा।
  2. घरों, मंदिरों और घाटों पर दीप जलाना।
  3. गंगा आरती और दीपदान — विशेष रूप से दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट और पंचगंगा घाट पर।
  4. भजन, कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रम, जिनसे पूरा काशी नगरी देवमय हो जाती है।
  5. रात को आतिशबाज़ी और दीपों की झिलमिलाहट से गंगा किनारा जीवंत हो उठता है।

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Dev Diwali का आध्यात्मिक संदेश

Dev Diwali सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह अंधकार पर प्रकाश, अहंकार पर विनम्रता, और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। यह त्योहार हमें यह भी सिखाता है कि जब भी दुनिया में अन्याय और अधर्म बढ़ता है, तब भगवान शिव जैसे दिव्य रूप उस अंधकार को मिटाने के लिए प्रकट होते हैं।

Dev Diwali का दीपदान, अपने भीतर के अंधकार — यानी अज्ञान, क्रोध, और ईर्ष्या — को मिटाने का प्रतीक है।

जब जगमगाती है काशी — Dev Diwali की दिव्यता और भव्यता

जब कार्तिक पूर्णिमा की रात वाराणसी में उतरती है, तब गंगा किनारे लाखों दीपों की पंक्तियाँ जगमगाने लगती हैं। नावों में बैठे श्रद्धालु आरती के मंत्र सुनते हैं, दीप जलाकर गंगा में प्रवाहित करते हैं और उस क्षण हर दिशा में दिव्यता का अनुभव होता है।

यही है Dev Diwali का असली अर्थ — जब देवता, मानव और प्रकृति — तीनों एक साथ प्रकाश के इस उत्सव में सम्मिलित होते हैं।

 

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Dev Diwali का सारांश

पर्व का नाम – Dev Diwali (Dev Diwali)

मनाने की तिथि – कार्तिक पूर्णिमा (दीपावली के लगभग 15 दिन बाद)

मुख्य आयोजन स्थल – वाराणसी (काशी) — गंगा नदी के घाट

पूज्य देवता – भगवान शिव

पौराणिक पृष्ठभूमि – त्रिपुरासुर राक्षस के वध के उपलक्ष्य में देवताओं द्वारा दीप प्रज्ज्वलन

मुख्य अनुष्ठान एवं परंपराएं – गंगा स्नान, दीपदान, गंगा आरती, दान-पुण्य और भक्ति-संगीत

आध्यात्मिक संदेश – अंधकार पर प्रकाश, अधर्म पर धर्म और असुरता पर देवत्व की विजय

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Author: kamalkant

कमल कांत सिंह एक उत्साही पत्रकार और लेखक हैं, जिन्हें समाचार और कहानी कहने का गहरा जुनून है। कई वर्षों के अनुभव के साथ, वे सामाजिक मुद्दों, संस्कृति और समसामयिक घटनाओं पर गहन विश्लेषण और आकर्षक लेखन के लिए जाने जाते हैं। कमल का उद्देश्य अपने लेखन के माध्यम से सच्चाई को उजागर करना और पाठकों को प्रेरित करना है। उनकी लेखनी में स्पष्टता, विश्वसनीयता और मानवीय संवेदनाओं का समावेश होता है, जो उन्हें एक विशिष्ट आवाज प्रदान करता है।