आध्यात्मिक नगरी Kashi में देहदान की बढ़ती भावना, मेडिकल रिसर्च में आ रहा बड़ा उपयोग

आध्यात्मिक नगरी Kashi में देहदान की बढ़ती भावना, मेडिकल रिसर्च में आ रहा बड़ा उपयोग

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आध्यात्मिक नगरी Kashi में देहदान की बढ़ती भावना—एक साल में 158 लोगों ने किया शरीर दान, मेडिकल रिसर्च में आ रहा बड़ा उपयोग

वाराणसी समाचार (Varanasi News):मोक्ष की नगरी कही जाने वाली Kashi न सिर्फ आध्यात्मिक दृष्टि से जगत को राह दिखा रही है, बल्कि अब वह विज्ञान और मानवता के संगम की भी मिसाल बन गई है। यहां हर दूसरे दिन एक व्यक्ति देहदान (Body Donation) कर समाज को नई दिशा दे रहा है। अपना घर आश्रम के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, बीते एक साल में 158 लोगों ने देहदान किया है। यह संख्या न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि यह बताती है कि वाराणसी में लोगों का झुकाव अब केवल मोक्ष की ओर नहीं, बल्कि मानवता और शिक्षा की ओर भी बढ़ रहा है।

ये सभी देहदान मुख्य रूप से मेडिकल कॉलेजों के छात्रों की शिक्षा और रिसर्च कार्यों में उपयोग हो रहे हैं। डॉक्टर बनने की दिशा में अग्रसर छात्रों को मानव शरीर की संरचना को समझने में यह बेहद मददगार साबित हो रहा है।

आध्यात्मिक नगरी Kashi में देहदान की बढ़ती भावना

मोक्ष की नगरी में नई सोच देहदान बन रहा है सेवा और ज्ञान का प्रतीक –

प्राचीन काल से Kashi को मृत्यु से मुक्ति देने वाली नगरी कहा जाता रहा है। लोग यहां मृत्यु को मोक्ष का द्वार मानते हैं। लेकिन अब इसी धरती पर मृत्यु के बाद भी जीवन देने की भावना जीवित हो रही है।

अपना घर आश्रम के संचालक डॉ. के. निरंजन बताते हैं कि वर्ष 2018 से 2025 तक के बीच कुल 228 लोगों का देहदान कराया गया है। इसमें से केवल पिछले एक वर्ष में ही 158 लोगों ने अपने शरीर को मेडिकल रिसर्च के लिए दान किया। यह न केवल सामाजिक दृष्टि से प्रेरणादायक है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि अब लोग मृत्यु के बाद भी ज्ञान का प्रसार करने में विश्वास रखते हैं।

डॉ. निरंजन कहते हैं, “Kashi में अब देहदान को मोक्ष का नया माध्यम समझा जाने लगा है। जो शरीर मृत्यु के बाद निष्प्रयोज्य होता था, वही अब डॉक्टरों और चिकित्सा शिक्षा के लिए अमूल्य बन गया है।”

देहदान की प्रक्रिया कैसे होती है

देहदान की प्रक्रिया पूरी तरह स्वैच्छिक होती है। अपना घर आश्रम में अक्सर ऐसे लोग भी पहुंचते हैं जिनकी मृत्यु स्वाभाविक कारणों से होती है। ऐसे मामलों में पुलिस की उपस्थिति में पंचनामा तैयार किया जाता है। यदि मृतक के परिजन नहीं मिलते, तो आश्रम की ओर से उनका देहदान मेडिकल संस्थानों को सौंपा जाता है।

पोस्टमार्टम के बाद शव रिसर्च के लिए उपयोगी नहीं रहता, इसलिए केवल स्वाभाविक मृत्यु वाले शवों को ही वैज्ञानिक अध्ययन के लिए सुरक्षित किया जाता है। देहदान के बाद शव को तीन महीने तक संरक्षित रखा जाता है ताकि यदि कोई परिजन सामने आए तो शव उन्हें सौंपा जा सके। यदि कोई दावा नहीं करता, तो शरीर को Kashi हिंदू विश्वविद्यालय (BHU-IMS) या अन्य मेडिकल कॉलेजों को सौंप दिया जाता है।

डॉ. निरंजन बताते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और संवेदनशीलता रखी जाती है। “देहदान व्यक्ति की अंतिम इच्छा होती है, इसलिए हम हर कदम पर उसका सम्मान करते हैं,” वे कहते हैं।

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BHU में सबसे ज्यादा पहुंचते हैं देहदान किए शव

वाराणसी स्थित अपना घर आश्रम की निकटता BHU-IMS (Institute of Medical Sciences) से होने के कारण अधिकतर देहदान किए गए शव वहीं भेजे जाते हैं। यह मेडिकल छात्रों के लिए एक बड़ा सहारा है, क्योंकि शरीर के वास्तविक अध्ययन से उन्हें चिकित्सा विज्ञान की सूक्ष्मताओं को समझने में मदद मिलती है।

डॉ. निरंजन का कहना है, “देहदान किसी व्यक्ति का सबसे बड़ा योगदान है। इससे न केवल चिकित्सा शिक्षा को मजबूती मिलती है बल्कि मृतक के जीवन का उद्देश्य भी आगे बढ़ता है। एक तरह से यह मृत्यु के बाद भी जीवन जीने का तरीका है।”

पूर्वांचल के अन्य मेडिकल कॉलेजों को भी अपना घर आश्रम से रिसर्च के लिए शव उपलब्ध कराए जाते हैं। इससे पूरे क्षेत्र में चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है।

क्या बोले बीएचयू के प्रोफेसर

बीएचयू के एनाटॉमी विभाग की प्रोफेसर डॉ. रोयाना सिंह का कहना है,

 “अपना घर आश्रम की देहदान पहल बेहद सराहनीय है। जिस तरह लोग नेत्रदान और रक्तदान के लिए आगे आते हैं, उसी तरह देहदान को भी जीवन का एक पुण्य कार्य समझा जाना चाहिए। इससे चिकित्सा शिक्षा को अमूल्य सहयोग मिलता है और भावी डॉक्टरों को समाज की सेवा का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।”

उन्होंने आगे कहा कि Kashi जैसे धार्मिक शहर से यह पहल पूरे देश के लिए उदाहरण है। यहां मृत्यु को सिर्फ अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

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समाज के लिए प्रेरणा

Kashi की यह परंपरा अब Varanasi की सुर्खियों में है और पूरे देश में चर्चा का विषय बन चुकी है। यहां के लोग यह संदेश दे रहे हैं कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि किसी और के जीवन की शुरुआत हो सकती है। देहदान की यह भावना समाज में मानवता, करुणा और विज्ञान को एक सूत्र में पिरो रही है।

स्वतंत्र वाणी के उपसंहारिक शब्द

देहदान केवल शरीर दान नहीं, बल्कि ज्ञान, सेवा और मानवता का दान है। काशी जैसे धार्मिक शहर में यह पहल आध्यात्मिकता और विज्ञान का सुंदर संगम बन गई है। आज काशी यह सिखा रही है कि मृत्यु के बाद भी व्यक्ति समाज के काम आ सकता है, और यही जीवन का सच्चा मोक्ष है।

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Author: kamalkant

कमल कांत सिंह एक उत्साही पत्रकार और लेखक हैं, जिन्हें समाचार और कहानी कहने का गहरा जुनून है। कई वर्षों के अनुभव के साथ, वे सामाजिक मुद्दों, संस्कृति और समसामयिक घटनाओं पर गहन विश्लेषण और आकर्षक लेखन के लिए जाने जाते हैं। कमल का उद्देश्य अपने लेखन के माध्यम से सच्चाई को उजागर करना और पाठकों को प्रेरित करना है। उनकी लेखनी में स्पष्टता, विश्वसनीयता और मानवीय संवेदनाओं का समावेश होता है, जो उन्हें एक विशिष्ट आवाज प्रदान करता है।