माता-पिता द्वारा PUBG खेलने से रोकने पर छात्र ने की आत्महत्या

माता-पिता द्वारा PUBG खेलने से रोकने पर छात्र ने की आत्महत्या

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माता-पिता द्वारा PUBG खेलने से रोकने पर छात्र ने की आत्महत्या, तेलंगाना का एक चौंकाने वाला मामला

तेलंगाना के निर्मल ज़िले से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने समाज को गहरे सदमे में डाल दिया है। यहाँ 16 साल के कक्षा 10 के छात्र रिसेंद्र ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली । वजह थी – PUBG गेम की लत। माता-पिता ने उसकी लत छुड़ाने के लिए उसका मोबाइल फ़ोन ज़ब्त कर लिया, लेकिन यह कदम उसके लिए असहनीय साबित हुआ। तीन दिन तक PUBG न खेलने का दबाव वह बर्दाश्त नहीं कर सका और मानसिक तनाव के चलते फांसी लगा ली।

माता-पिता द्वारा PUBG खेलने से रोकने पर छात्र ने की आत्महत्या

यह घटना सिर्फ़ एक परिवार की पीड़ा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गहरी चेतावनी है। यह दर्शाता है कि ऑनलाइन गेमिंग की अनियंत्रित लत बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई और सामाजिक जीवन को कैसे गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।

रोज़ाना 10 घंटे PUBG में डूबा रहता है छात्र

मीडिया में आई खबरों के मुताबिक, रिसेंद्र प्रतिदिन 10 घंटे से अधिक समय PUBG खेलने में बिताता था। धीरे-धीरे यह लत इतनी बढ़ गई कि उसने पढ़ाई और स्कूल जाना तक छोड़ दिया। उसने अपने माता-पिता से साफ़ कह दिया था कि स्कूल जाने से PUBG खेलने के लिए उसका “कीमती समय” कम हो जाता है। दरअसल, यह एक ऐसा व्यवहार है जिसे विशेषज्ञ गेमिंग डिसऑर्डर का लक्षण मानते हैं।

माता-पिता द्वारा PUBG खेलने से रोकने पर छात्र ने की आत्महत्या

माता-पिता ने भी समस्या की गंभीरता को समझा और उसे मनोचिकित्सक और न्यूरोसर्जन के पास काउंसलिंग के लिए ले गए। लेकिन वहाँ भी ऋषेंद्र ने सहयोग करने से इनकार कर दिया। बताया जाता है कि उसने डॉक्टर के साथ भी दुर्व्यवहार किया और उन्हें धमकाया। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि लत ने उसके व्यवहार और सोचने की क्षमता को गहराई से प्रभावित किया था।

जब फ़ोन छीनना जानलेवा कदम बन गया

आखिरकार, हारकर उसके माता-पिता ने उसका मोबाइल फ़ोन छीन लिया। यह कदम ऋषेंद्र के लिए असहनीय था और तीन दिन तक गेम से दूर रहने के बाद उसने अवसाद में आकर आत्महत्या कर ली।

यहाँ सवाल खुलकर सामने आता है: क्या सिर्फ़ फ़ोन छीन लेने से समस्या का समाधान हो सकता है? शायद नहीं। बल्कि, कई बार स्थिति और बिगड़ जाती है। सही तरीका यही है कि धीरे-धीरे नियंत्रण किया जाए, विकल्प उपलब्ध कराए जाएँ और पेशेवर मदद से लगातार काउंसलिंग की जाए।

भारत में PUBG और ऑनलाइन गेमिंग की बढ़ती लत

यह पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में, भारत में PUBG समेत अन्य ऑनलाइन बैटल रॉयल गेम्स की लत ने युवाओं के बीच गहरी जड़ें जमा ली हैं।

  • बिहार में ट्रेन हादसा: पश्चिम चंपारण में रेलवे ट्रैक पर बैठकर तीन किशोर PUBG खेल रहे थे। कानों में ईयरफोन लगे होने के कारण, वे आती हुई ट्रेन की आवाज़ नहीं सुन पाए और उनकी दर्दनाक मौत हो गई।
  • हैदराबाद में कैब ड्राइवर: एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक कैब ड्राइवर एक हाथ से गाड़ी चलाते और दूसरे हाथ से PUBG खेलते हुए दिखाई दे रहा था। ज़रा सोचिए, यात्रियों की जान कितनी ख़तरे में थी।
  • लखनऊ में आत्महत्या का मामला: उत्तर प्रदेश में एक 18 वर्षीय युवक ने PUBG की लत के कारण आत्महत्या कर ली। उसके सुसाइड नोट में साफ़ लिखा था कि वह पढ़ाई और गेम खेलने के बीच संतुलन नहीं बना पा रहा था और उसे डर था कि यह लत उसके परिवार को भी बर्बाद कर देगी।

ये घटनाएँ अलग-अलग राज्यों की हैं, लेकिन संदेश एक ही है—गेमिंग की लत अब एक सामाजिक समस्या का रूप ले चुकी है।

PUBG की लत क्यों खतरनाक है?

PUBG और अन्य ऑनलाइन गेम महज़ मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये मस्तिष्क पर ऐसे रासायनिक प्रभाव डालते हैं जो सोचने और व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।

  • ये मस्तिष्क में डोपामाइन (एक आनंद देने वाला न्यूरोट्रांसमीटर) छोड़ते हैं।
  • जीतने की चाहत, लेवल अप करने का रोमांच और दोस्तों के साथ ऑनलाइन खेलने का मज़ा खिलाड़ियों को बार-बार वापस आने के लिए मजबूर करता है।
  • धीरे-धीरे यह सिर्फ़ एक “खेल” नहीं रह जाता, बल्कि एक “ज़रूरत” बन जाता है।
  • नतीजतन – नींद की कमी, पढ़ाई पर असर, चिड़चिड़ापन, शारीरिक स्वास्थ्य का बिगड़ना और रिश्तों में दरार।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी 2019 में गेमिंग डिसऑर्डर को एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या माना है। यानी यह सिर्फ़ एक “टाइमपास” या “शौक” नहीं, बल्कि एक ऐसा विकार है जिसका इलाज ज़रूरी है।

अभिभावकों के लिए चेतावनियाँ और सुझाव

तेलंगाना की इस घटना से अभिभावकों को एक गंभीर सबक सीखने की ज़रूरत है। बच्चों से सिर्फ़ मोबाइल या इंटरनेट छीन लेना ही समाधान नहीं है। ज़रूरी है कि तीनों स्तरों – व्यवहार, दिनचर्या और मानसिक संतुलन – पर ध्यान दिया जाए।

विशेषज्ञों के अनुसार:

  • बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल की सीमाएँ तय करें और खुद भी उनका पालन करें।
  • उन्हें गेमिंग के बजाय खेलकूद, संगीत, पेंटिंग, पढ़ने-लिखने जैसी गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें।
  • बच्चे के साथ खुलकर बातचीत करें। गुस्से या डाँट-फटकार के बजाय समझदारी और सहानुभूति के साथ करें।
  • ज़रूरत पड़ने पर पेशेवर सलाह लें और धैर्यपूर्वक उसका पालन करें।

समाज और सरकार की भूमिका

  • यह समस्या सिर्फ़ घर तक ही सीमित नहीं है। पूरे समाज, शिक्षा व्यवस्था और सरकार को मिलकर कदम उठाने की ज़रूरत है।
  • स्कूलों में डिजिटल जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए जहाँ बच्चों को संतुलित डिजिटल जीवन सिखाया जाए।
  • सरकार को ऑनलाइन गेमिंग पर सख्त नियम-कानून बनाने होंगे, ताकि नाबालिग बच्चों की अनियंत्रित पहुँच को रोका जा सके।
  • मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

निष्कर्ष: ज़िम्मेदारी लेने का समय आ गया है

तेलंगाना के ऋषेंद्र की आत्महत्या एक बार फिर हमें मजबूर करती है कि क्या हम बच्चों को ऐसे जाल में फँसा रहे हैं जिस पर हम खुद काबू नहीं पा सकते।

पबजी जैसे खेल केवल मनोरंजन का साधन हैं, इन्हें कभी भी पढ़ाई, परिवार और असल ज़िंदगी पर हावी नहीं होने देना चाहिए। अगर कोई बच्चा गेमिंग के कारण खुद से, अपने परिवार और भविष्य से कट जाता है, तो यह सिर्फ़ एक “शौक” नहीं रह जाता—यह एक खतरनाक लत बन जाता है।

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Author: kamalkant

कमल कांत सिंह एक उत्साही पत्रकार और लेखक हैं, जिन्हें समाचार और कहानी कहने का गहरा जुनून है। कई वर्षों के अनुभव के साथ, वे सामाजिक मुद्दों, संस्कृति और समसामयिक घटनाओं पर गहन विश्लेषण और आकर्षक लेखन के लिए जाने जाते हैं। कमल का उद्देश्य अपने लेखन के माध्यम से सच्चाई को उजागर करना और पाठकों को प्रेरित करना है। उनकी लेखनी में स्पष्टता, विश्वसनीयता और मानवीय संवेदनाओं का समावेश होता है, जो उन्हें एक विशिष्ट आवाज प्रदान करता है।