भारत ने फिर गाजा संघर्ष विराम प्रस्ताव पर मतदान से किनारा , इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष पर वैश्विक बहस तेज, विपक्ष ने सरकार पर उठाए सवाल :
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नई दिल्ली:
भारत ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) में पारित गाजा संघर्ष विराम प्रस्ताव पर मतदान से खुद को अलग रखा, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में एक नई बहस छिड़ गई है। प्रस्ताव में गाजा पट्टी में चल रहे इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष के बीच तत्काल और स्थायी युद्ध विराम की मांग की गई थी। 193 सदस्यीय महासभा में 149 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, जबकि 12 देशों ने विरोध किया और 19 देशों ने मतदान से खुद को अलग रखा – जिसमें भारत भी शामिल है।
भारत की बदली नीति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया :
भारत का यह फैसला इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि भारत ने दिसंबर 2024 में भी इसी तरह के गाजा संघर्ष विराम प्रस्ताव का समर्थन किया था। लेकिन महज छह महीने बाद ही भारत की नीति में यह बदलाव देखने को मिला है। भारत ने इससे पहले अक्टूबर 2023, दिसंबर 2022 और 2023 में इसी तरह के प्रस्तावों से खुद को अलग कर लिया था। अब यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार की विदेश नीति इजरायल के प्रति नरम बनी हुई है और फिलिस्तीन पर संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि, परवथानेनी हरीश ने कहा कि भारत गाजा में मानवीय संकट को लेकर “गहरी चिंता” में है, लेकिन उनका मानना है कि केवल बातचीत और कूटनीति ही इस लंबे समय से चले आ रहे इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष को हल कर सकती है।
“हमारा रुख पिछले मतदान की निरंतरता है। भारत का मानना है कि बातचीत और कूटनीति ही दोनों पक्षों को एक साथ लाने का एकमात्र तरीका है,” – परवथानेनी हरीश, भारत के संयुक्त राष्ट्र स्थायी प्रतिनिधि
भारत का अलग रुख : ब्रिक्स, एससीओ और दक्षिण एशिया से असहमति
इस बार गाजा युद्धविराम प्रस्ताव पर मतदान से दूर रहने वाला भारत एकमात्र देश था, जबकि ब्रिक्स, एससीओ और दक्षिण एशियाई देशों के बाकी देश प्रस्ताव के पक्ष में खड़े थे। यह भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को दर्शाता है, लेकिन वैश्विक मंच पर इसकी अलग-थलग स्थिति को भी उजागर करता है।
इस बीच, अमेरिका और इजरायल ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। अमेरिका की कार्यवाहक राजदूत डोरोथी शिया ने प्रस्ताव की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें हमास की निंदा नहीं की गई है। दूसरी ओर, रूस ने जोर देकर कहा कि गाजा में इजरायल की बमबारी और मानवीय सहायता में बाधा ने स्थिति को “त्रासदी” बना दिया है।
फिलिस्तीन की स्थिति : भूख, बीमारी और मौत का संकट –
संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के अनुसार, गाजा में स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। अब तक 55,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें से अधिकांश महिलाएं और बच्चे हैं। लगभग 2 मिलियन की आबादी वाले गाजा में आधे से अधिक लोग भुखमरी और कुपोषण के शिकार हैं।
“एक समय था जब 15,000 मौतें एक चौंका देने वाली संख्या थी, लेकिन अब मौतों का आंकड़ा 55,000 को पार कर गया है,” – रूसी राजदूत वसीली नेबेंज़्या
फ्रांस-सऊदी सम्मेलन: दो-राज्य समाधान की दिशा में नई पहल –
इस बीच, फ्रांस और सऊदी अरब संयुक्त रूप से 17 जून से एक महत्वपूर्ण सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं, जिसमें इजरायल और फिलिस्तीन के बीच दो-राज्य समाधान पर चर्चा की जाएगी। सम्मेलन में भारत की भागीदारी पर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। हालांकि भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर वर्तमान में पेरिस में अपने फ्रांसीसी समकक्ष से मिल रहे हैं और संभावना है कि भारत को एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल में आमंत्रित किया जाएगा।
फ्रांस के राष्ट्रपति के सलाहकार ने सम्मेलन को “शांति की दिशा में एक ठोस कदम” बताया है, जहां सुरक्षा, आर्थिक स्थिति, मानवीय राहत और पुनर्निर्माण जैसे मुद्दों पर आठ प्रमुख गोलमेज चर्चाएं होंगी।
विपक्ष ने सरकार पर हमला किया :
भारत के इस फैसले पर देश के भीतर भी तीखी प्रतिक्रिया हुई है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस फैसले को “भारत की नैतिक विरासत के साथ विश्वासघात” बताया।
“60,000 लोग मारे गए हैं, जिनमें से ज़्यादातर महिलाएँ और बच्चे हैं। और हम चुप हैं? यह शर्मनाक है,” – प्रियंका गांधी वाड्रा
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्रालय से जवाब माँगा कि क्या भारत ने “न्याय, शांति और अहिंसा की नीति” को त्याग दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि यह फ़ैसला भारत को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग कर देता है।
भाजपा का जवाब: “नाटकीय विरोध”
विपक्ष के हमले का जवाब देते हुए भाजपा ने कहा कि कांग्रेस “फर्जी खबरों की फैक्ट्री” बन गई है। पार्टी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कहा कि भारत का वोट कोई नया रुख़ नहीं है, बल्कि पुराने रुख़ को जारी रखना है, जो संवाद और कूटनीति में विश्वास करता है।
“भारत का स्पष्ट मानना है कि केवल बातचीत के माध्यम से ही स्थायी समाधान पाया जा सकता है। हमने हमेशा नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय सहायता को प्राथमिकता दी है,” – प्रदीप भंडारी, भाजपा प्रवक्ता
भारत और फिलिस्तीन: ऐतिहासिक संबंध
भारत ने 1988 में फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी और अब वह फिलिस्तीन को मान्यता देने वाले 147 देशों में शामिल है। भारत ने पहले भी फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन किया है, लेकिन हाल के वर्षों में इसका रुख थोड़ा अधिक संतुलित हो गया है – खासकर इजरायल के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने के बाद।
निष्कर्ष :
भारत का फिलिस्तीनी गाजा युद्ध विराम प्रस्ताव मुद्दे से दूर रहने का निर्णय कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह न केवल भारत की विदेश नीति में बदलाव का संकेत देता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर इसकी स्थिति और नैतिक दृष्टिकोण पर भी सवाल उठाता है।
जहां एक ओर भारत समाधान के रूप में “बातचीत और कूटनीति” में विश्वास करता है, वहीं दूसरी ओर उसे गाजा में मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ अपनी आवाज उठाने की वैश्विक उम्मीदों का भी सामना करना पड़ता है।
क्या भारत अपनी ऐतिहासिक भूमिका को फिर से परिभाषित कर रहा है? या यह एक रणनीतिक चुप्पी है जो भविष्य की कूटनीति में इसकी स्थिति को मजबूत करेगी? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में भारत की कार्रवाइयों से मिलेंगे।
Author: kamalkant
कमल कांत सिंह एक उत्साही पत्रकार और लेखक हैं, जिन्हें समाचार और कहानी कहने का गहरा जुनून है। कई वर्षों के अनुभव के साथ, वे सामाजिक मुद्दों, संस्कृति और समसामयिक घटनाओं पर गहन विश्लेषण और आकर्षक लेखन के लिए जाने जाते हैं। कमल का उद्देश्य अपने लेखन के माध्यम से सच्चाई को उजागर करना और पाठकों को प्रेरित करना है। उनकी लेखनी में स्पष्टता, विश्वसनीयता और मानवीय संवेदनाओं का समावेश होता है, जो उन्हें एक विशिष्ट आवाज प्रदान करता है।










