इजराइल-ईरान संघर्ष से तेल की कीमतों में उछाल

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इजराइल-ईरान संघर्ष से तेल की कीमतों में उछाल: भारत के लिए मुद्रास्फीति और व्यापार घाटे का जोखिम

नई दिल्ली, 14 जून, 2025 इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक बार फिर गहरे संकट में डाल दिया है। इस भू-राजनीतिक तनाव का सबसे बड़ा प्रभाव कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर साफ़ देखा जा रहा है, जो लगातार उछाल मार रही हैं। शुक्रवार को वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में 7% से अधिक की तेजी देखी गई, जो भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों के लिए गहरी चिंता का विषय बन गया है।

इजराइल-ईरान संघर्ष से तेल की कीमतों में उछाल

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल

शुक्रवार को वैश्विक तेल बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में उल्लेखनीय उछाल दर्ज किया गया, जहां यह $4.87 (लगभग 7.02%) बढ़कर $74.23 प्रति बैरल पर बंद हुआ। कारोबारी सत्र के दौरान यह मूल्य $78.50 प्रति बैरल तक जा पहुंचा, जो 27 जनवरी के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। इस पूरे सप्ताह के दौरान ब्रेंट क्रूड में कुल मिलाकर 12.5% की तेजी देखी गई है। वहीं, यूएस डब्ल्यूटीआई क्रूड ऑयल की कीमतों में भी जोरदार उछाल देखा गया, जहां यह शुक्रवार को 4.94 डॉलर यानी लगभग 7.26% की वृद्धि के साथ 72.98 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुई। यह साप्ताहिक आधार पर करीब 13% की उल्लेखनीय बढ़त को दर्शाता है।

विश्लेषकों का कहना है कि इजराइल-ईरान संघर्ष के कारण मध्य पूर्व से तेल आपूर्ति में व्यवधान की संभावना ने निवेशकों के बीच चिंता बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि यह वृद्धि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त है।

संघर्ष की पृष्ठभूमि

13 जून को इजराइल ने ईरान के कई परमाणु स्थलों, बैलिस्टिक मिसाइल कारखानों और सैन्य कमांडरों को निशाना बनाकर हवाई हमले किए। इजराइल ने इसे ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकने के उद्देश्य से एक “निरंतर अभियान” बताया। जवाब में ईरान ने मिसाइलों से तेल अवीव पर हमला किया और दक्षिणी इजराइल में कई विस्फोटों की खबरें आईं।

हालांकि ईरान की राष्ट्रीय तेल शोधन और वितरण कंपनी ने कहा है कि उसके शोधन और भंडारण केंद्र पूरी तरह सुरक्षित और चालू हैं, लेकिन बाजार में तनाव बना हुआ है।

भारत के लिए खतरा

भारत अपनी 80% से अधिक कच्चे तेल की जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है। भले ही भारत ईरान से सीधे तौर पर ज्यादा तेल आयात नहीं करता है, लेकिन इजराइल-ईरान संघर्ष के कारण वैश्विक कीमतों में उछाल का भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ सकता है।

ग्रांट थॉर्नटन इंडिया के ऊर्जा विशेषज्ञ अमित कुमार कहते हैं, “भारत का तेल आयात मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों पर निर्भर है, जिनका परिवहन होर्मुज जलडमरूमध्य से होता है। इस जलमार्ग में कोई भी रुकावट भारत की तेल आपूर्ति को बाधित कर सकती है।”

होर्मुज जलडमरूमध्य को खतरा

होर्मुज जलडमरूमध्य एक प्रमुख समुद्री मार्ग है, जिसके माध्यम से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है। यदि ईरान इस मार्ग को अवरुद्ध करता है या इसमें कोई बाधा आती है, तो भारत को वैकल्पिक और महंगे मार्गों से तेल लाना होगा। इससे न केवल लागत बढ़ेगी, बल्कि समय भी अधिक लगेगा।

 निर्यात पर असर

इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन पंकज चड्ढा ने कहा, “अगर स्वेज नहर और लाल सागर मार्ग बाधित होता है, तो भारतीय जहाजों को केप ऑफ गुड होप से होकर जाना पड़ेगा, जिसमें 15-20 दिन अतिरिक्त लग सकते हैं। इसके साथ ही प्रति कंटेनर ₹500 से ₹1000 का अतिरिक्त खर्च आएगा, जिससे कुल निर्यात लागत में 40-50% की वृद्धि हो सकती है।”

बाजार में उथल-पुथल

तेल की कीमतों में उछाल के कारण शुक्रवार को भारतीय और वैश्विक शेयर बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। VIX इंडेक्स में करीब 8% की उछाल आई, जो निवेशकों की बढ़ती चिंता को दर्शाता है।

सोने की कीमतों में उछाल

महामारी या युद्ध जैसे अनिश्चित समय में सोने को ‘सुरक्षित ठिकाना’ माना जाता है। इस बार भी निवेशकों ने सोने की ओर धावा बोला और इसकी कीमत ₹1 लाख प्रति 10 ग्राम से ऊपर पहुंच गई। विशेषज्ञों के अनुसार, यह सिर्फ तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि केंद्रीय बैंकों की खरीद और मुद्रास्फीति के डर के कारण दीर्घकालिक रुझान बन रहा है।

भारतीय तेल कंपनियों पर प्रभाव

नकारात्मक प्रभाव:

कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत की सरकारी तेल कंपनियों की लागत बढ़ेगी, जिससे उनकी लाभप्रदता प्रभावित होगी।

कंपनी शेयर में बदलाव कारण

एचपीसीएल -2.5% लागत में वृद्धि के कारण दबाव

बीपीसीएल -1.8% मार्जिन पर प्रभाव

आईओसी -2.2% सरकारी मूल्य नियंत्रण के कारण नुकसान

सकारात्मक प्रभाव:

दूसरी ओर, तेल की कीमतों में वृद्धि से तेल अन्वेषण और उत्पादन कंपनियों को लाभ हो सकता है।

कंपनी शेयर परिवर्तन लाभ

ONGC +3.4% बढ़ी हुई कीमत से अतिरिक्त राजस्व
ऑयल इंडिया +2.9% कम उत्पादन लागत, आय में वृद्धि

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतों में प्रति डॉलर एक की वृद्धि होती है, तो इससे ONGC और ऑयल इंडिया जैसी तेल उत्पादक कंपनियों को सालाना ₹300 से ₹400 करोड़ तक का अतिरिक्त मुनाफा हो सकता है। वहीं दूसरी ओर, HPCL, BPCL और IOC जैसी रिफाइनिंग कंपनियों को ₹200 से ₹300 करोड़ तक का घाटा उठाना पड़ सकता है।

भविष्य की संभावनाएँ

जूलियस बेयर के अर्थशास्त्री नॉर्बर्ट रकर कहते हैं, “इतिहास बताता है कि ऐसे तनावों में कीमतें अस्थायी रूप से बढ़ती हैं, लेकिन अगर आपूर्ति में कोई वास्तविक व्यवधान नहीं होता है, तो स्थिरता जल्द ही लौट आती है।”

एसएंडपी ग्लोबल कमोडिटी इनसाइट्स के अनुसार, जब तक इज़राइल और ईरान के बीच जारी टकराव से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं होती, तब तक कच्चे तेल की कीमतों में दीर्घकालिक और स्थायी वृद्धि की संभावना बेहद कम बनी रहेगी।

हालांकि, अगर स्थिति बिगड़ती है, तो भारत को रणनीतिक तेल भंडार का उपयोग करना पड़ सकता है या पंप कीमतों को स्थिर रखने के लिए सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता हो सकती है।

 निष्कर्ष :

इज़राइल-ईरान संघर्ष का न केवल तेल की कीमतों पर बल्कि वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ रहा है। भारत के लिए यह सतर्कता और रणनीतिक तैयारी का समय है, क्योंकि आयात लागत में वृद्धि मुद्रास्फीति, व्यापार घाटे और रुपये पर दबाव डाल सकती है।

सरकार और कंपनियों की अगली रणनीति इस बात पर निर्भर करेगा कि यह संघर्ष कितना गहराता है और क्या यह वास्तव में तेल आपूर्ति को प्रभावित करता है या नहीं। लेकिन अभी के लिए, बाजार अपनी सांस रोके हुए है – एक और मिसाइल की आवाज़ और एक और कीमत उछाल!

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Author: kamalkant

कमल कांत सिंह एक उत्साही पत्रकार और लेखक हैं, जिन्हें समाचार और कहानी कहने का गहरा जुनून है। कई वर्षों के अनुभव के साथ, वे सामाजिक मुद्दों, संस्कृति और समसामयिक घटनाओं पर गहन विश्लेषण और आकर्षक लेखन के लिए जाने जाते हैं। कमल का उद्देश्य अपने लेखन के माध्यम से सच्चाई को उजागर करना और पाठकों को प्रेरित करना है। उनकी लेखनी में स्पष्टता, विश्वसनीयता और मानवीय संवेदनाओं का समावेश होता है, जो उन्हें एक विशिष्ट आवाज प्रदान करता है।