ऑपरेशन सिंदूर प्रतिनिधिमंडल को लेकर भाजपा-कांग्रेस में टकराव, विपक्ष ने केंद्र पर लगाया ‘सस्ती राजनीति’ का आरोप
पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर देश का पक्ष रखने के लिए भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर प्रतिनिधिमंडल अभियान को लेकर अब राजनीति गरमा गई है। इस पहल में भारत की ओर से 32 देशों और यूरोपीय संघ के मुख्यालय ब्रुसेल्स में सात अलग-अलग सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजे जा रहे हैं। इस प्रतिनिधिमंडल में भाजपा, कांग्रेस, एनसीपी, डीएमके, शिवसेना और अन्य दलों के नेता शामिल हैं, लेकिन कांग्रेस ने प्रतिनिधियों के चयन को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

कांग्रेस का कहना है कि केंद्र सरकार ने उनके द्वारा भेजे गए नेताओं को दरकिनार कर अपने हिसाब से नामों का चयन किया है। वहीं, केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार का कहना है कि प्रतिनिधिमंडल में ऐसे नेताओं का चयन किया गया है जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष प्रभावी ढंग से रख सकते हैं।
ऑपरेशन सिंदूर प्रतिनिधिमंडल : क्या है मामला ?
भारत सरकार ने हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर प्रतिनिधिमंडल’ शुरू किया है। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों को यह बताना है कि भारत किस तरह से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का सामना कर रहा है और आतंकवाद के खिलाफ उसकी नीति क्या है। यह एक कूटनीतिक प्रयास है, जिसमें सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को शामिल किया गया है, ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि आतंकवाद पर भारत में एकमत है।
सरकार ने सात दलों में विभाजित सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का गठन किया है, जो अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, सऊदी अरब के साथ-साथ यूरोपीय संघ के मुख्यालय ब्रुसेल्स जैसे प्रभावशाली देशों का दौरा करेगा।
कांग्रेस ने लगाए आरोप
वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सरकार पर हमला करते हुए कहा कि यह सरासर झूठ है कि कांग्रेस से नाम नहीं मांगे गए। उन्होंने दावा किया कि 16 मई की सुबह कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और विपक्ष के नेता राहुल गांधी की किरण रिजिजू से बातचीत हुई थी। इसके बाद कांग्रेस ने आनंद शर्मा, गौरव गोगोई, सैयद नासिर हुसैन और अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के नाम सुझाए।
जयराम रमेश ने कहा, “यह कहना सरासर झूठ है कि कांग्रेस से नाम नहीं मांगे गए। सरकार ने खुद बात की और हमारे नेताओं ने औपचारिक रूप से नाम दिए। फिर भी हमारे सुझाए नेताओं में से केवल आनंद शर्मा को ही प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया। अन्य तीन को नजरअंदाज कर दिया गया। यह सस्ती राजनीति का उदाहरण है।”
भाजपा का पक्ष
भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने बयान जारी कर कहा कि प्रतिनिधिमंडल के चयन में किसी पार्टी की आंतरिक राजनीति को महत्व नहीं दिया गया। उन्होंने कहा, “सरकार ने यह फैसला किसी पार्टी के आंतरिक समीकरण के हिसाब से नहीं बल्कि राष्ट्रहित में लिया है।”
सरकार के मुताबिक, जिन नेताओं का चयन किया गया है, उन्हें अंतरराष्ट्रीय मामलों का अनुभव है और वे भारत का पक्ष सही तरीके से रख सकते हैं। लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि यह चयन एकतरफा और पक्षपातपूर्ण है।
भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव की वजह
कांग्रेस का आरोप है कि यह सरकार की सोची-समझी रणनीति है ताकि विपक्ष की भागीदारी केवल प्रतीकात्मक ही रहे। कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा, “प्रधानमंत्री मोदी जब भी विदेश जाते हैं तो हमेशा कांग्रेस की आलोचना करते हैं और अब जब उन्हें हमारे नेताओं की जरूरत है तो उन्होंने औपचारिक बातचीत करना भी जरूरी नहीं समझा।” यह विवाद सिर्फ प्रतिनिधिमंडल के नामों को लेकर नहीं है, बल्कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठाता है जिसमें विपक्ष की भागीदारी सीमित है। 26/11 के बाद का उदाहरण 2008 के मुंबई आतंकी हमले के बाद की स्थिति को याद करते हुए जयराम रमेश ने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सभी राजनीतिक दलों से सलाह-मशविरा करने के बाद एक प्रतिनिधिमंडल भेजा था। उन्होंने कहा, “तब देशहित में राजनीति से ऊपर उठकर फैसला लिया गया था। लेकिन आज भाजपा सरकार बातचीत नहीं चाहती।” प्रतिनिधिमंडल में कौन-कौन से नेता शामिल हैं? सरकार द्वारा घोषित ऑपरेशन सिंदूर के सात प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व निम्नलिखित नेता कर रहे हैं:
1. बैजयंत पांडा (भाजपा)
2. रविशंकर प्रसाद (भाजपा)
3. संजय कुमार झा (जदयू)
4. श्रीकांत शिंदे (शिवसेना)
5. शशि थरूर (कांग्रेस)
6. कनिमोझी (डीएमके)
7. सुप्रिया सुले (राकांपा-सपा)
इनमें से कई नेता ऐसे हैं जिन्हें कांग्रेस ने नामित नहीं किया था, जैसे शशि थरूर और मनीष तिवारी। इससे कांग्रेस की नाराजगी और बढ़ गई है।
राजनीतिक विशेषज्ञों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे मुद्दों पर पारदर्शिता और संवाद की जरूरत है। अगर केंद्र सरकार विपक्ष के साथ बैठकर नाम तय करती तो विवाद की गुंजाइश नहीं रहती। लेकिन जब विदेश नीति जैसे महत्वपूर्ण विषय पर भी विपक्ष की अनदेखी की जाती है तो लोकतांत्रिक सहमति की भावना कमजोर होती है।
निष्कर्ष : संवादहीनता विवाद की जड़ बनी
ऑपरेशन सिंदूर प्रतिनिधिमंडल पर उठे विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि संवादहीनता है।
भारत की मौजूदा राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सामंजस्य की कमी है। भाजपा सरकार को जहां यह समझना चाहिए कि देश के संवेदनशील मुद्दों पर विपक्ष की भागीदारी जरूरी है, वहीं कांग्रेस को भी महज बयानबाजी से ऊपर उठकर ठोस रणनीति बनानी चाहिए। यह प्रतिनिधिमंडल दुनिया भर में भारत का पक्ष रखेगा तो जरूरी है कि वे देश की एकता का भी प्रतीक बनें। लेकिन फिलहाल यह अभियान भी राजनीतिक रस्साकशी का शिकार होता नजर आ रहा है।
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Author: Swatantra Vani
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