इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद पोस्ट’ मामले में अंसार अहमद सिद्दीकी की जमानत याचिका खारिज की

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद पोस्ट’ मामले में अंसार अहमद सिद्दीकी की जमानत याचिका खारिज की, कोर्ट ने जाताई चिंता ,कहा- देश विरोधी मानसिकता बढ़ रही है :

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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद पोस्ट’ शेयर करने के आरोपी अंसार अहमद सिद्दीकी की जमानत याचिका को सख्ती से खारिज कर दिया है। इस फैसले में कोर्ट ने न सिर्फ आरोपी के कृत्य की आलोचना की, बल्कि देश में बढ़ती देश विरोधी मानसिकता और अदालतों की सहनशीलता को भी चिंता का विषय बताया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायपालिका की नरमी के कारण ऐसे अपराध लगातार बढ़ रहे हैं।

—पूरा मामला :  क्या है आरोप?

बुलंदशहर जिले के छतरी थाने में दर्ज एफआईआर के मुताबिक 62 वर्षीय अंसार अहमद सिद्दीकी ने 3 मई 2025 को फेसबुक पर एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए गए थे और मुसलमानों से ‘अपने पाकिस्तानी भाइयों’ का साथ देने की अपील की गई थी। इस वीडियो में ‘जिहाद’ को बढ़ावा देने की बात भी कही गई थी।

यह पोस्ट ऐसे समय में आई है जब 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले से पूरा देश सदमे में है, जिसमें 26 हिंदू तीर्थयात्रियों की जान चली गई। सरकारी वकील के मुताबिक यह पोस्ट आतंकवाद से सहानुभूति रखने वाली है और इससे देश की एकता और अखंडता को खतरा है।

—इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

जस्टिस सिद्धार्थ की अध्यक्षता वाली सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा,

  1.  “देश में इस तरह के अपराध अब आम होते जा रहे हैं और इसकी एक बड़ी वजह अदालतों का उदार और सहनशील रवैया है। राष्ट्रविरोधी मानसिकता वाले लोगों के ऐसे कृत्यों पर सख्ती जरूरी है।”

कोर्ट ने साफ कहा कि आरोपी का कृत्य संविधान और उसके आदर्शों का अपमान है। यह भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देता है।

  1.  “याचिकाकर्ता की उम्र से पता चलता है कि वह स्वतंत्र भारत में पैदा हुआ और पला-बढ़ा है। इसके बावजूद उसका आचरण राष्ट्रविरोधी है और वह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण का हकदार नहीं है।”

—पाकिस्तान जिंदाबाद पोस्ट का असर

‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ पोस्ट का मामला इसलिए और गंभीर हो गया क्योंकि इसे ऐसे समय शेयर किया गया जब देश पहले से ही एक बड़े आतंकी हमले से आहत था। कोर्ट ने माना कि इस तरह के पोस्ट समाज को बांटने और धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देने का काम करते हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ किया कि इस तरह की सामग्री संविधान के अनुच्छेद 51ए (ए) और 51ए (सी) का सीधा उल्लंघन है, जिसमें देश की एकता और अखंडता की रक्षा करना हर नागरिक का कर्तव्य बताया गया है।

— अंसार अहमद सिद्दीकी की ओर से क्या कहा गया?

अंसार अहमद सिद्दीकी की ओर से वकील ने कोर्ट में दलील दी कि उन्होंने सिर्फ एक वीडियो शेयर किया था, उन्होंने खुद कुछ नहीं कहा। साथ ही बताया गया कि वे 62 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक हैं और कई स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रसित हैं।

लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि

  1. “वरिष्ठ नागरिक होने का मतलब यह नहीं है कि वह राष्ट्र विरोधी सामग्री साझा करने के लिए स्वतंत्र है। सोशल मीडिया पर की गई एक पोस्ट भी समाज पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।”

—इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश और आगे की कार्रवाई

कोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए निचली अदालत को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 197 और 152 तथा दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 309 के तहत इस मामले में जल्द से जल्द सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया।

  1. “देश के संविधान और उसकी संस्थाओं का अपमान करने वाले व्यक्ति को किसी भी तरह की संवैधानिक छूट देना उचित नहीं है। यह एक गंभीर अपराध है, जिसमें आरोपी को जमानत देना देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ होगा।”

—इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दी चेतावनी

इस मामले के जरिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरे समाज को चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वालों और राष्ट्र विरोधी पोस्ट शेयर करने वालों को कानून बख्शेगा नहीं।

  1.  “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति देश की संप्रभुता और एकता के खिलाफ कुछ भी कहे या लिखे। ऐसी अभिव्यक्तियाँ न केवल संविधान का उल्लंघन हैं, बल्कि देश के अस्तित्व के लिए भी खतरा हैं।”

—सोशल मीडिया और राष्ट्रविरोधी तत्व

यह मामला इस बात का उदाहरण है कि कैसे कुछ असामाजिक तत्व सोशल मीडिया का इस्तेमाल राष्ट्रविरोधी विचारों को फैलाने के लिए कर रहे हैं। अदालत ने इसे बेहद गंभीर बताया और सोशल मीडिया पर निगरानी रखने और सख्त कानून लागू करने की जरूरत पर बल दिया।

—निष्कर्ष :

‘पाकिस्तान जिंदाबाद पोस्ट’ मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल अंसार अहमद सिद्दीकी के खिलाफ है, बल्कि उन सभी लोगों के लिए सख्त चेतावनी है जो देश की अखंडता और एकता को बाधित करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान और देश की संप्रभुता का सम्मान सर्वोपरि है।

यह फैसला यह भी संदेश देता है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट जैसी अदालतें राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर समझौता नहीं करेंगी। पाकिस्तान जिंदाबाद जैसे पोस्ट करने जैसी घटनाओं को गंभीर राजद्रोह माना जाएगा और अंसार अहमद सिद्दीकी जैसे व्यक्तियों को संविधान के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण नहीं मिलेगा।

 

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Swatantra Vani
Author: Swatantra Vani

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